जीवन में हर शख्स को आगे बढ़ने के लिए कभी न कभी लोन की जरूरत पड़ती ही है। अलग-अलग तरह के लोन में अलग-अलग शर्तें होती हैं। कुछ लोन्स में आपको बैंक के पास चीजें गिरवी रखनी पड़ती हैं और कुछ लोन ऐसे ही भी मिल जाते हैं। लोन लेते वक्त अगर आपका पाला भी Collateral Securities (कोलैटरल सिक्यॉरिटी) शब्द से पड़ा है, लेकिन इसका अर्थ नहीं पता तो लीजिए यहां समझिए।
सबसे पहले समझिए कि लोन दो तरह के होते हैं। पहला अनसिक्योर्ड (पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड,पर लोन), जिसमें आपको कोई सिक्यॉरिटी नहीं जमा करनी होती। दूसरा होता है सिक्यॉर्ड लोन। जैसे होम लोन, कार लोन, गोल्ड लोन, बिजनस लोन। इन्हें लेते वक्त बैंक आपसे सिक्यॉरिटी रखवाता है। अब ये सिक्यॉरिटी भी दो तरीके की होती हैं। पहली प्राइम और दूसरी कोलैटरल सिक्यॉरिटी। अगर कर्जदार लोन नहीं चुका पाता तो सिक्यॉरिटी वाली चीज बेचकर बैंक अपना पैसा निकालता है।
अगर सिर्फ प्राइम सिक्यॉरिटी पर बैंक राजी नहीं है, तब वह एडिशनल सिक्यॉरिटी के लिए कहता है। इन्हीं सिक्यॉरिटी को कोलैटरल सिक्यॉरिटी कहते हैं।
दोनों में फर्क एक उदाहरण से समझिये :-
मान लीजिए कि आपको एक घर लेना है, जिसकी कीमत एक करोड़ है, लेकिन आपके पास सिर्फ 20 लाख रुपये हैं और बाकी पैसा आप लोन ले रहे हैं। बैंक आपको लोन देगा लेकिन उसके चुकाए जाने तक घर के जरूरी कागज बैंक के पास गिरवी रहेंगे। ऐसे में वह घर ही प्राइम सिक्यॉरिटी है।
अब मनिए आपको बिजनस के लिए मशीनें खरीदनी हैं, जिनकी कीमत फिलहाल 1.50 करोड़ है और आप वह पूरा पैसा बैंक से लेना चाहते हैं। बैंक आपको तब भी पैसा देगा, लेकिन तब बैंक करीब 2.50 करोड़ की सिक्यॉरिटी मांग सकता है। ऐसे में 1.50 करोड़ तो मशीनों की कीमत हो गई। बाकी 1 करोड़ की कोई चीज भी आपको बैंक के पास रखनी होगी। वह ही कोलैटरल सिक्यॉरिटी कहलाएगी।
(इकनोमिक टाइम्स से साभार)
सबसे पहले समझिए कि लोन दो तरह के होते हैं। पहला अनसिक्योर्ड (पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड,पर लोन), जिसमें आपको कोई सिक्यॉरिटी नहीं जमा करनी होती। दूसरा होता है सिक्यॉर्ड लोन। जैसे होम लोन, कार लोन, गोल्ड लोन, बिजनस लोन। इन्हें लेते वक्त बैंक आपसे सिक्यॉरिटी रखवाता है। अब ये सिक्यॉरिटी भी दो तरीके की होती हैं। पहली प्राइम और दूसरी कोलैटरल सिक्यॉरिटी। अगर कर्जदार लोन नहीं चुका पाता तो सिक्यॉरिटी वाली चीज बेचकर बैंक अपना पैसा निकालता है।
अगर सिर्फ प्राइम सिक्यॉरिटी पर बैंक राजी नहीं है, तब वह एडिशनल सिक्यॉरिटी के लिए कहता है। इन्हीं सिक्यॉरिटी को कोलैटरल सिक्यॉरिटी कहते हैं।
दोनों में फर्क एक उदाहरण से समझिये :-
मान लीजिए कि आपको एक घर लेना है, जिसकी कीमत एक करोड़ है, लेकिन आपके पास सिर्फ 20 लाख रुपये हैं और बाकी पैसा आप लोन ले रहे हैं। बैंक आपको लोन देगा लेकिन उसके चुकाए जाने तक घर के जरूरी कागज बैंक के पास गिरवी रहेंगे। ऐसे में वह घर ही प्राइम सिक्यॉरिटी है।
अब मनिए आपको बिजनस के लिए मशीनें खरीदनी हैं, जिनकी कीमत फिलहाल 1.50 करोड़ है और आप वह पूरा पैसा बैंक से लेना चाहते हैं। बैंक आपको तब भी पैसा देगा, लेकिन तब बैंक करीब 2.50 करोड़ की सिक्यॉरिटी मांग सकता है। ऐसे में 1.50 करोड़ तो मशीनों की कीमत हो गई। बाकी 1 करोड़ की कोई चीज भी आपको बैंक के पास रखनी होगी। वह ही कोलैटरल सिक्यॉरिटी कहलाएगी।
(इकनोमिक टाइम्स से साभार)
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